प्रकृति या विकृति
(Jan 13 - 06)
फिर एक दिन गहरी स्याही में ख़फी हो ,
खो बैठी अपना वजूद वो,
रगों से चूस कर ले गया वो सवेरा,
दश्त तारीकी में घोल गया, सभी गोशों को...
एक भूका सन्नाटा, चौखट पर चीख रहा हो जैसे,
और वो, बेचैन, रूबरू, मकतूल* होने को...
उस सुबह से पूछूं मैं ,
एक इज़तेराब* से पुर* कहानी होगी,
कॉपते वजूद की जुबानी होगी,
मेरी गोद से मेरा उजाला ले गया वो,
मेरे ख्वाब, मेरी आरज़ू, मेरे कल का क़त्ल हुआ है...
उस अँधेरी रात से पूछूं मैं उसकी कहानी,
उसमे कई दर्दनाक चीखों का ज़िक्र हुआ है...
*मकतूल - जिसका क़त्ल हुआ हो
*इज़तेराब - बेचैनी , perturbation
*पुर - भरा हुआ, full of
फिर एक दिन गहरी स्याही में ख़फी हो ,
खो बैठी अपना वजूद वो,
रगों से चूस कर ले गया वो सवेरा,
दश्त तारीकी में घोल गया, सभी गोशों को...
एक भूका सन्नाटा, चौखट पर चीख रहा हो जैसे,
और वो, बेचैन, रूबरू, मकतूल* होने को...
उस सुबह से पूछूं मैं ,
एक इज़तेराब* से पुर* कहानी होगी,
कॉपते वजूद की जुबानी होगी,
मेरी गोद से मेरा उजाला ले गया वो,
मेरे ख्वाब, मेरी आरज़ू, मेरे कल का क़त्ल हुआ है...
उस अँधेरी रात से पूछूं मैं उसकी कहानी,
उसमे कई दर्दनाक चीखों का ज़िक्र हुआ है...
*मकतूल - जिसका क़त्ल हुआ हो
*इज़तेराब - बेचैनी , perturbation
*पुर - भरा हुआ, full of
1 Comments:
इस कविता में मैं एक प्रेयसी की पीड़ा का अनुभव कर रहा हूँ.
यहाँ पर प्रेम एकतरफा है या दोतरफा कह पाना मुश्किल है, फिर भी मुझे एकतरफा ही महसूस हो रहा है.
अक्सर आप अपने मन में वो सिलसिले बना लेते हैं जो कभी होते ही नहीं है और उन्हें हकीकत भी मान लेते हैं.
सच जानते और समझते हुए भी मन (दिल) उसे मानने के लिए तैयार नहीं होता.
लेकिन जब वो क्षण आता है जिसे हम "moment of truth" कहते हैं तब फिर या तो इंसान पूरी तरह टूट जाता है या पूरी तरह जाग जाता है........
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