सहर
(Apr 27 - 05)
दिल के दुरूं ये नफरत,
जुबां पर ये तल्खियाँ,
ज़हन में ये मंजिल -ए- जंग,
न जाने किस सहरा में गुम हैं वो खुशियाँ...
ये किस तारीकी* की तरफ बढ़ते जा रहे हैं कदम,
और न जाने किस तारीकी में ख़फी* थी अब तक ये दुनिया...
जुबां से पहले हथियार हैं तैयार,
एक से एक बढ़ कर हैं ऐयार...
चल पड़े हैं उस अँधेरे की ओर,
जिसे वो ज़हीन* समझते हैं उजाला!...
जिसे वो ज़हीन* समझते हैं उजाला!...
जहां, सिर्फ है, लहू, तड़पते शव और वीराना...
डूबना ही है बीच मझधार,
चाहे इस पार, चाहे उस पार,
क्योंकि इस विशाल सागर का कोई है नहीं किनारा...
डूबना ही है बीच मझधार,
चाहे इस पार, चाहे उस पार,
क्योंकि इस विशाल सागर का कोई है नहीं किनारा...
हर कू-ब-कू* है हिरांसा*
हर चेहरे पर है सन्नाटा,
धरती भी कुछ कपकपाई सी है,
और ये खला भी कुछ घबराई सी है...
ज़हन पे न जाने कितनी हैं सिलवटें...
और दश्त* रात में केवल हैं करवटें...
बस ! अब चलें उस सहर की ओर ,
ढूँढने ख़ुशी, हसीं, अमन, चैन,
चेहरों से खोई तसल्ली,
*तल्खियों से गारत वो दिन, वो रैन...
चलें ढूँढने वो लौ, वो उजाला,
जहां हो मिठास, दोस्ती और भाईचारा...
ढूँढने ख़ुशी, हसीं, अमन, चैन,
चेहरों से खोई तसल्ली,
*तल्खियों से गारत वो दिन, वो रैन...
चलें ढूँढने वो लौ, वो उजाला,
जहां हो मिठास, दोस्ती और भाईचारा...
मैं अपने कमरे के दरीचे में बैठी,
अक्सर ये सोचती हूँ...
की वो सहर कभी तो आएगी...
वो सहर कभी तो आएगी...
*ज़हीन - समझदार ( (with sarcasm)
*कू-ब-कू - गली-गली
*हिरांसा - डरी हुई
*दश्त - वीराना
अक्सर ये सोचती हूँ...
की वो सहर कभी तो आएगी...
वो सहर कभी तो आएगी...
*ज़हीन - समझदार ( (with sarcasm)
*कू-ब-कू - गली-गली
*हिरांसा - डरी हुई
*दश्त - वीराना
*दरीचा- खिड़की
*गारत- बर्बाद
*तल्खियों - कड़वाहट
*ख़फी - खोई हुई, lost
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